अपने प्रदेश की भाषा किसे अच्छी नहीं लगती और खास कर जब वो अंतर्राष्ट्रीय ख्याति नाम की हो। भोजपुरी के लिए भी कुछ ऐसा ही है कुछ हम पूर्वांचल वालों के दिलों में.
अगर बिहार के अलग अलग क्षेत्रों की बात करें तो वैसे मैं अंगिका बोली वाले अंग क्षेत्र से आता हूँ।
अगर हम पूर्वांचल के लोक गीतों की चर्चा करें तो हमारी अच्छी खासी समृद्ध परम्परा रही है । पर आज कल हम विभिन्न मीडिया के माध्यमों में लोकगीत सुनते हैं उनमे से कुछ ही उस परम्परा को आगे बढाते हुए मालूम होते हैं.
आज लोकगीतों की चर्चा करने के पीछे मेरा दो मकसद है। पहला तो ये की आजकल मैं अपने गाँवया कहें छोटे शहर तारापुर में रह रहा हूँ और हमेशा अलग अलग मौकों पर गाये जाने वाले गीतों से रूबरू होता रहता हूँ या तो सीधे ग्रामीणों के मुख से या स्थानीय रेडियो चैनल को सुनकर.
मैं आशा करता हूँ कि जल्द ही मैं कुछ तोहफे आपके लिए लेकर आउंगा।
मेरा दूसरा मकसद कुछ स्वार्थी किस्म का है।
शायद आप लोगों में से कुछ को पता होगा कि भोजपुरी का एक नया चैनेल शुरू किया गया है - महुआ। इसी चैनल पर रियलिटी शो के पुराने खिलाडी गजेन्द्र सिंह ,जिनकी सा रे गा मा और क्लोज अप अन्ताक्षरी को सराहा गया, लेकर आये हैं लोकगीतों के इंडियन आइडल का प्रतिरूप " सुर संग्राम". इस कार्यक्रम का प्रसारण 5 जूनसे शुरू हो चुका है. सप्ताह में दो दिन शुक्र और शनि , के रात साढ़े आठ बजे से इसका प्रसारण शुरू होता है. इसका पुनर्प्रसारण दूसरे दिन 11 बजे दिन में होता है. इसके होस्ट हैं मनोज तिवारी, और जज हैं मालिनी अवस्थी और कल्पना.
कल के इसी प्रोग्राम में एक गायक की प्रस्तुति हुई ,नाम है आलोक कुमार और घर कजरा,बिहार। श्री ब्रह्मदेव पासवान , जो खुद एक प्रसिद्ध लोक गायक हैं, उनका छोटा बेटा और मेरे अभिन्न मित्र श्री अरविंद कुमार जी ,जो अभी सैनिक स्कूल ,तिलैया में संगीत शिक्षक हैं, का छोटा भाई, मतलब मेरा छोटा भाई.
आप उसे जरूर देखें और अपनी प्रतिक्रया दें।
अगर आप कल नहीं देख पाए तो आज दिन में 11 बजे देखना ना भूलें.
Sunday, June 07, 2009
पूर्वांचल के लोकगीत और एक सुर संग्राम
Thursday, December 04, 2008
अब मेरी बारी है.........
आज कई दिनों की खामोशी के बाद फिर आपसे रूबरू हो रहा हूँ। वक़्त के थपेड़ों के साथ चलते हुए कब साल दर साल गुजर जाते हैं पता ही नहीं चलता। हम अपने आप में मसरूफ़ होते चले जाते हैं। स्थितियां कुछ ऐसी बदलती हैं कि हमें अपने शौक से भी मुँह मोड़ लेना पड़ता है,चाहे थोड़ी देर के लिये ही सही.पर आज मैं आपके सामने उपस्थित हुआ हूँ तो मैं अपनी बात आपसे share नहीं करने जा रहा हूँ.
बात है एक टेक्नोक्रैट के दिल की... एक भावी कुशल प्रबंधक की...
जी हाँ! मैं बात कर रहा हूँ " भारतीय प्रबंध संस्थान(IIM ), कोझीकोड, केरल" में पढ़ने वाले मेरे छोटे भाई की. भारतीय तकनीकी संस्थान(IIT),रूड़की से विद्युत अभियांत्रिकी में स्नातक मेरा छोटा भाई ’सुजीत कुमार’... जिसके बारे मैं आप पहले भी मेरी इस पोस्ट में पढ़ चुके हैं...
मुँबई की वो दहशत भरी रात ने सभी के दिलो दिमाग को मथ दिया। इन्हीं पलों में कुछ पंक्तियाँ सुजीत के दिल से निकली होंगी जिसे उसने अपने ब्लॉग पर डाला है. आप भी पढ़ें...
मुझे डर लगता है.
कल से फैला है सन्नाटा है हर तरफ़.
कोई भी मरा नही है
पता नही मुझे क्यूँ लगता है
अब मेरी बारी है...
(पूरी कविता के लिये ऊपर की पंक्तियों पर क्लिक करें..)
Monday, August 04, 2008
चलें बाबा के द्वार... चलें देवघर नगरिया.. बोल - बम !
जय शिव शंकर!
दोस्तो,
यदि आपने मेरी कल की पोस्ट पढ़ी होगी, तो आप ने देखा होगा कि मैने एक बात शुरुआत में ही लिखी थी.. "......... पता नहीं कितने रूपों में सावन हमारे आस पास बिखरा पड़ रहा है. हर कोई अपने अपने तरीके से इसे समेटने में लगा है. ........आशा है हमेशा की तरह एक बार फ़िर आप मेरे साथ यादों के सफ़र के हमराह होंगे."
मैं झारखंड राज्य स्थित देवघर में अवस्थित बाबा भोलेनाथ के ज्योतिर्लिंग स्वरूप बाबा बैद्यनाथ, बाबा रावणेश्वर के बारे में चर्चा कर रहा था. आपने देखा कि किस तरह बाबा के इस स्वरूप की स्थापना हुई. आज तीसरी श्रावणी सोमवारी के पावन अवसर पर मैं आपको ले चल रहा हूँ इसी काँवरिया मार्ग पर जिसपर चलकर भक्तगण 105 km का दुरूह सफ़र पैदल तय करते हैं. और इसी से जुड़ी मेरी वो बचपन की यादें, जिनका हमराह मैं आपको बनाना चाह रहा हूँ. आशा है मेरे वे बिछड़े साथी जो दो महीने पहले मेरी blog यात्रा के रुकने पर मुझसे दूर हो गये थे फ़िर आ मिलेंगे.
बहरहाल मैं बात कर रहा था काँवरिया भक्तों की. भक्तगण दूर दूर के प्रदेशों से विभिन्न साधनों के द्वारा पहले सुलतानगंज पहुँचते हैं. सुल्तानगंज, बिहार राज्य के भागलपुर जिले में स्थित एक छोटा सा शहर है. जो देश से सड़क और रेल मार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है. यहीं बहती है उत्तरवाहिनी गंगा. यहाँ इस पतित पावनी उत्तरवाहिनी गंगा का अपना एक विशेष महत्व है. कहते हैं, भगवान राम ने यहीं काँवरिया वेश में गंगाजल भरकर पैदल राह तय कर बाबा बैद्यनाथ को जल अर्पण किया था. काँवर उठा कर ले जाने की प्रथा तभी से शुरू मानी जाती है.
उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर पंडे श्रद्धालु भक्तों को संकल्प कराते हैं, श्रद्धालु पात्रों में जल भरते हैं और कंधे पर काँवर रख कर आकाश गुँजित उदघोष करते हैं - "बोल बम" और रवाना हो जाते हैं एक भक्तिमय लंबे पथ पर जिसपर लगभग तीन दिनों के सफ़र बाद वो मंजिल आनी है जब बाबा के दर्शन होंगे, एक संकल्प पूरा होगा. पूरे सावन महीने तक रोज लाखों की तादाद में काँवरियों का जत्था यहाँ से बाबा नगरी के लिये प्रस्थान करता है. एक दूसरे का उत्साह बढ़ाते काँवरिया चलते जाते हैं, बढ़ते जाते हैं. अगर मैं कहूँ कि काँवरिया नहीं चलते वरन काँवरियों का एक रेला सा चलता है तो ज्यादा सटीक होगा. दूर तक जहाँ तक भी नज़र जायेगी सिर्फ़ गेरुआ रंग की एक कतार सी ही दिखेगी पूरे काँवरिया पथ में.
बोल बम.. बोल बम. बोल बम.. बोल बम.
बाबा नगरिया दूर है, जाना जरूर है.. भैया बम, बोलो बम, माता बम बोलो बम, चाची बम , बोलो बम.
सारे काँवरिया एक दूसरे को बम कह कर संबोधित करते है.नाचते गाते काँवरिया आगे की ओर बढ़ते जाते हैं.
इस 105 किमी के सफ़र में कई पड़ाव आते हैं जब काँवरिया रुकते हैं, सुस्ताते हैं, अपनी थकान मिटाते हैं.सुल्तानगंज से लेकर बाबाधाम तक काँवरिया पथ के दोनों ओर खाने पीने की स्थाई और अनगिनत अस्थाई दुकाने हर कदम पर आपको मिलेंगी. अब इन दुकानों में खाने की क्वालिटी पर बहस हो तो वो एक अलग मुद्दा हो जायेगा. जगह जगह medical camp भी लगे होते हैं. थॊड़ी देर इनकी सेवायें लेने के बाद निकल पड़ते हैं आगे के सफ़र पर बोल बम की गुंजायमान उदघोष के साथ. इन्हीं कई पड़ावों में एक पड़ाव है " तारापुर" जहाँ का आपका यह दोस्त रहने वाला है. सुलतानगंज के बाद मुख्य पडावों मे हैं- मासूमगंज, असरगंज, रणग्राम और तब तारापुर. लगभग 20 किमी के बाद यह पड़ाव आता है तो अधिकतर काँवरिया यहीं रुकना पसंद करते हैं. तारापुर की आँखों देखी विवरणी मैं अपने अगले पोस्ट में दूंगा जब आप मेरे साथ पूरे तारापुर के काँवरिया पथ का सजीव वर्णन आपके सामने रखूंगा. फ़िलहाल आगे चलें...
तारापुर के बाद 7 किमी पर आता है रामपुर, एक दूसरा अति महत्वपूर्ण पड़ाव. यहा लगभग सभी काँवरिया रुकते हैं क्यूँकि अधिकतर काँवरियों के लिये यहाँ लगभग रात हो जाती है और आगे का सफ़र थोड़ा मुश्किल भरा हो जाता है.
दूसरे दिन सवेरे उठकर नित्य क्रिया से निवृत हो अपने काँवर पुन: कंधे पर टांग कर बम आगे की ओर निकल पड़ते हैं. यह भी नियम है कि काँवर को पूरे सफ़र के दौरान कभी भूमि स्पर्श नहीं होने देना है,सो काँवर को विश्र्ष प्रकार के बनाये गये stands पर ही रखा जाता है. इस दौरान कुत्ते अर्थात भैरो बम का स्पर्श भी वर्जित है सो सारे बम उससे बचते हुए चलते है. जब भी काँवर अपने स्थान से पुनः उठाया जाता है तो पहले पाँच बार कान पकड़ कर उठक बैठक लगाना भी अनिवार्य है. पूरे यात्रा के दौरान श्रृंगार प्रसाधनों का उपयोग भी वर्जित है.विशुद्ध शाकाहारी भोजन करते हुए और इन सारे कठिन नियमों का पालन करते हुए लोग बाबा के दरबार पहुँचते हैं.
रामपुर के बाद आता है कुमरसार फ़िर जिलेबिया मोड़. कुमरसार से आगे बढ़ते ही एक नदी पार करनी होती है, कभी कभी नदी का बहाव इतना तेज होता है कि सारे काँवरिया एक दूसरे को पकड़ कर चलने को बाध्य होते है. जिलेबिया मोड़, जैसा नाम से ही प्रतीत होता है, पहाड़ियों पर रास्ते हैं और ये मानो जलेबी के जैसे घुमावदार. आगे आता है सूईया पहाड़, यहाँ के पत्थर मानो सूई की तरह पाँवों में गड़ जाते हैं. पर बाबा के भक्तों को ऐसी कोई भी मुसीबत नहीं रोक नहीं सकती. पैरों में पड़े छाले, बहता खून भी मानॊं उनके उत्साह को डिगा नहीं पाता है. हरेक बाधा का और तेज हुँकार से काँवरिया जवाब देते हैं... बोल बम का नारा है.. बाबा एक सहारा है.
सूईया से कटोरिया, इनाराबरन, गोड़ियारी होते हुए काँवरिया बम आखिरकार पहुँच जाते हैं दर्शनियाँ. दर्शनियाँ आते ही बाबा के भक्तों की खुशी और उत्सह दूना हो जाता है क्योंकि यहाँ से ही बाबा के मंदिर की उपरी बाग नजर आने लग जाता है. काँवरियों का रेला सा उमड़ रहा है. हर तर्फ़ गेरुआ वस्त्रों में लिपटे बम ही दिखाई दे रहे है. अब बस एक ही किलोमीटर तो रह गया है बाबा का नगर. लो बाबाधाम तो हम आ पहुँचे हैं. पहले शिवगंगा में स्नान कर लें फ़िर लाईन में लग कर बाबा बैद्यनाथ को जल अर्पण करना है.
अहा! कितना मनोरम दृश्य है. बोल..बम हर हर महादेव , ऊँ नमः शिवाय की ध्वनि से चहुँलोक गुँजायमान हो रहा है. लोग बब के मंदिर की प्रदक्षिणा कर मंदिर में बाबा पर जलाभिषेक कर रहे है.
बाबा बैद्यनाथ की जय... हर हर.. बम बम..
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अभी बाबा का प्रसाद लेना तो बाकी ही है. चलें बाहर, देखें कितनी दुकाने सजी हुई हैं. यहाँ से उत्कृष्ट पेड़े, मकुनदाना और चूड़ा (चिवड़ा) प्रसाद के रूप में लें. गले में डालने के लिये मालायें( बद्धियाँ) लें, सुहागिनों के लिये सिंदूर भी ले लें.
अब जाकर हमारा संकल्प पूरा हुआ... अब सभी अपने अपने घरों की ओर प्रस्थान करें.
जय शिव शंभु!
