ये जिंदगी किसे बहाकर कहाँ ले जाय , ये कोई नहीं जानता है.
इसी तरह दौड़ती भागती दुनिया में तमाम तरह की चीजों से टकराते हुए मैं आखिर देश की राजधानी में अपना ठौर ढूंढता हुआ आ ही गया. जिंदगी ने मुझे अभी तक उतनी खुशियाँ नहीं दी है या यूं कहे कि इच्छाए कभी मरती नहीं और अच्छे से अच्छे की कोशिश में हम अपनी राह चुनते जाते हैं. इन्हीं राहों को चुनने की चाह ने मुझे अचानक दिल्ली पहुंचा दिया. देखता हूँ के यहाँ रह कर मैं उन बची खुची राहों को तलाश कर पाता हूँ कि नहीं.
( चित्र साभार nidhitayal.blogspot.com/)
Saturday, May 08, 2010
जिंदगी जिधर ले जाए...
Friday, April 30, 2010
सुर संग्राम विजेता………….. मैं ....?
इस सुपरहिट ग्रैंड फिनाले को हुए 6 महीने हो गए. उससे मुलाक़ात भी पहले हो चुकी थी. पर इस बार मैं अपनी मोटरसाइकिल से पटना आ रहा था और रास्ते में उसके घर रुक गया था. चाचाजी और चाचीजी ने आशीर्वाद दिया. दिन भर रुक कर खूब सारी बातें हुई. मेरे दोस्त (और उसके बड़े भैया ) , अरविन्द जी भी जो थे. बेचारे सभी अपने घर के renovation में लगे हुए थे और मजदूर काम कर कर रहे थे. अब वो सेलेब्रिटी जो बन गया है. परेशानी तो आपको साफ़ दिख रहा होगा.
पता नहीं मैं ऐसे पुरस्कार जीत पाऊँगा या नहीं पर उसे अपने हाथ में थाम तो सकता ही हूँ.
Saturday, October 24, 2009
एक बेहतरीन के लिए, एक आग्रह दिल से....
दोस्तों, आज से लगभग 5 महीने पहले मैंने एक पोस्ट आपको समर्पित की थी। उस पोस्ट का मौजूं था " महुआ" चॅनल पर प्रसारित होने वाला प्रोग्राम - सुर संग्राम. उस प्रोग्राम में एक गायक का मैंने जिक्र किया था जिसका नाम है आलोक कुमार। और ये आलोक एक तरह से मेरा छोटा भाई ही है.
पाँच महीने बाद के कठिन सफ़र के दौरान बिहार के बेहतरीन ग्यारह गायकों को पीछे छोड़ते हुए वो अब फाइनल तक आ पहुंचा है। उसके सामने हैं उत्तर प्रदेश के उम्दा गायक मोहन राठौर, जिन्होंने अपने राज्य के बेहतरीन ग्यारह को पीछे छोड़ते हुए फाइनल में अपना स्थान पक्का किया है.
पाँच महीने बाद के कठिन सफ़र के दौरान बिहार के बेहतरीन ग्यारह गायकों को पीछे छोड़ते हुए वो अब फाइनल तक आ पहुंचा है। उसके सामने हैं उत्तर प्रदेश के उम्दा गायक मोहन राठौर, जिन्होंने अपने राज्य के बेहतरीन ग्यारह को पीछे छोड़ते हुए फाइनल में अपना स्थान पक्का किया है.
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